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यहाँ सबकुछ बे_सबात है ...!

आज के दौर में ज्यादातर पढ़े लिखे लोग कुदरत के नजारों से दूर हो गए है । जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा सीमेंट के जंगलों में ही गुज़र जाता है । इसी जंगल में कोई 1BHK में तो कोई 2 या 3BHK + के घोंसले में रहते  है जहां से  कुदरत का नज़ारा देखना बहुत ही मुश्किल है । इसी कारण ही कुदरत का ऑब्जर्वेशन भी नहीं कर पाते है । दरिया और समंदर तो दूर की बात सितारों से भरा आकाश भी देखने को नहीं मिलता है । 

  दूसरी तरह ऐसे भी खुश नसीब लोग है जो घर से ही कुदरत के नज़रे का लुत्फ उठा सकते है ,कुदरत का खेल देख सकते है और कुदरत को थोड़ा ज्यादा समझ के कुछ लिख भी देते है !
  आज की सूफी शायरी जैसी ही शायरी कुदरत से ही जुड़ी हुई है जो Yash Murad ने लिखी है । 
  इस शायरी में कुदरत की वो सच्चाई सामने रखी है जिसे जानने के बाद कोई नास्तिक भी सोच में पड़ जाए । 

  आइए पहले वही शायरी को खूब सूरत फोटो के साथ देखते है । 
क्या खूब कहा हैं की इस जिंदगी में कुछ भी कायम नहीं ना दर्द ना खुशी और ना जिंदगी । सबकुछ दरिया की तरह बह जाता है , बादल की तरह उड़ के खो जाता है । 
  तो क्यों ना खुलकर जीए जिंदगी ? 
    

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